मनसावेदितार्थस्य तद्देशित्वमथोच्यते ।
वर्णिते योगिता कस्य यदि वा तत्स्वरूपतः ॥११२॥
manasāveditārthasya taddeśitvamathocyate |
varṇite yogitā kasya yadi vā tatsvarūpataḥ
(यदि) फिर कहा जाए कि मन से आवेदित (निवेदित) अर्थ की उस (मानस) देश में स्थिति (हो जाती है) — (तो) वर्णित (किए जाने) पर किसकी (किसके साथ) योगिता? अथवा यदि (अर्थ के अपने) स्वरूप से (संयोग कहो, तो वही कठिनाई)।