तेन वा सम्प्रतीतेऽर्थे क्रियते किं तदात्मना ।
तत्स्वरूपात्मसंयोगः संयोगोऽभिन्नदेशयोः ॥१११॥
tena vā sampratīte'rthe kriyate kiṃ tadātmanā |
tatsvarūpātmasaṃyogaḥ saṃyogo'bhinnadeśayoḥ
अथवा, उस (मन) के द्वारा अर्थ के सम्प्रतीत (ज्ञात) हो जाने पर, उस आत्मा से क्या किया जाता है? (आवश्यक होगा) आत्मा का उस (अर्थ के) स्वरूप के साथ संयोग — किन्तु संयोग तो अभिन्न-देश वाले दो (वस्तुओं) में (होता है) (जो अमूर्त आत्मा और मूर्त अर्थ नहीं हैं)।