वर्णनेन च चैतन्यमेतावन्मनसो यदि ।
स्वात्मशक्तिसमावेशादमूर्तावेशता कथम् ॥११०॥
varṇanena ca caitanyametāvanmanaso yadi |
svātmaśaktisamāveśādamūrtāveśatā katham
और यदि मन की चेतनता (केवल) इतनी ही, अर्थात् वर्णन-मात्र (है) — तो (यह भी) अपनी ही (चित्-) शक्ति के समावेश से (होती है); (अन्यथा) अमूर्त (चित्) का (विषयों में) आवेश कैसे (समझाया जाए)?