करणे ज्ञानसम्बन्धाद्बाह्यार्थे किं न कल्प्यते ।
बुद्धेर्गुणत्वं मनसि प्राप्नुयादथ चेतसा ॥१०८॥
karaṇe jñānasambandhādbāhyārthe kiṃ na kalpyate |
buddherguṇatvaṃ manasi prāpnuyādatha cetasā
यदि करण (इन्द्रिय) में ज्ञान के सम्बन्ध से (ज्ञान मानते हो), तो बाह्य अर्थ में क्यों नहीं कल्पित करते? और (तब) बुद्धि का गुणत्व मन में आ पड़ेगा — (यह कठिनाई) तब (केवल) चित् (के स्वीकार) से (हल होती है)।