The Vision of Śiva· 4.108 / 124

The Vision of Śiva4.108

4.108
करणे ज्ञानसम्बन्धाद्बाह्यार्थे किं न कल्प्यते । बुद्धेर्गुणत्वं मनसि प्राप्नुयादथ चेतसा ॥१०८॥
karaṇe jñānasambandhādbāhyārthe kiṃ na kalpyate | buddherguṇatvaṃ manasi prāpnuyādatha cetasā
— करण में ; — ज्ञान के सम्बन्ध से ; — बाह्य अर्थ में ; — क्यों नहीं कल्पित ; — बुद्धि का ; — गुणत्व ; — मन में ; — आ पड़ेगा ; — फिर ; — चित् (के स्वीकार) से

यदि करण (इन्द्रिय) में ज्ञान के सम्बन्ध से (ज्ञान मानते हो), तो बाह्य अर्थ में क्यों नहीं कल्पित करते? और (तब) बुद्धि का गुणत्व मन में आ पड़ेगा — (यह कठिनाई) तब (केवल) चित् (के स्वीकार) से (हल होती है)।