The Vision of Śiva· 4.107 / 124

The Vision of Śiva4.107

4.107
अथ ज्ञानं न मनसस्तज्ज्ञानमुपपद्यते । करणत्वाज्जडत्वाच्च तस्य चेदात्मनात्र किम् ॥१०७॥
atha jñānaṃ na manasastajjñānamupapadyate | karaṇatvājjaḍatvācca tasya cedātmanātra kim
— अब यदि ; — ज्ञान ; — मन का नहीं ; — वह ज्ञान ; — उपपन्न (करना) होगा ; — करण होने के कारण ; — और जड़ होने के कारण ; — उसकी ; — यदि ; — आत्मा (का) ; — यहाँ क्या

अब यदि ज्ञान मन का नहीं — (तो भी) वह ज्ञान (किसी का तो) उपपन्न करना होगा; और (मन के) करण होने तथा जड़ होने के कारण, यदि (उसे) आत्मा (का कहो) — तो यहाँ (मन से) क्या (प्रयोजन)?