अथ ज्ञानं न मनसस्तज्ज्ञानमुपपद्यते ।
करणत्वाज्जडत्वाच्च तस्य चेदात्मनात्र किम् ॥१०७॥
atha jñānaṃ na manasastajjñānamupapadyate |
karaṇatvājjaḍatvācca tasya cedātmanātra kim
अब यदि ज्ञान मन का नहीं — (तो भी) वह ज्ञान (किसी का तो) उपपन्न करना होगा; और (मन के) करण होने तथा जड़ होने के कारण, यदि (उसे) आत्मा (का कहो) — तो यहाँ (मन से) क्या (प्रयोजन)?