The Vision of Śiva· 4.106 / 124

The Vision of Śiva4.106

4.106
शाशक्या मूर्तरूपत्वाद्रूपं चेन्न कथं गुणः । गुणिनो नीयतेऽन्यत्र तृषार्तैश्चाकृतिं प्रति? ॥१०६॥
śāśakyā mūrtarūpatvādrūpaṃ cenna kathaṃ guṇaḥ | guṇino nīyate'nyatra tṛṣārtaiścākṛtiṃ prati?
— ग्राह्य (शक्य) ; — मूर्त-रूप होने के कारण ; — रूप (वर्ण) ; — यदि ; — नहीं ; — कैसे ; — गुण ; — गुणी से ; — ले जाया जाता है ; — अन्यत्र ; — तृषा से पीड़ितों द्वारा ; — आभास की ओर

यदि (कहो कि) रूप (वर्ण) मूर्त-रूप होने के कारण ग्राह्य है — तो गुण कैसे गुणी से अन्यत्र ले जाया जाता है, जैसे तृषा से पीड़ित (मृगतृष्णिका में) (जल के) आभास की ओर (ले जाते दीखते हैं)?