शाशक्या मूर्तरूपत्वाद्रूपं चेन्न कथं गुणः ।
गुणिनो नीयतेऽन्यत्र तृषार्तैश्चाकृतिं प्रति? ॥१०६॥
śāśakyā mūrtarūpatvādrūpaṃ cenna kathaṃ guṇaḥ |
guṇino nīyate'nyatra tṛṣārtaiścākṛtiṃ prati?
यदि (कहो कि) रूप (वर्ण) मूर्त-रूप होने के कारण ग्राह्य है — तो गुण कैसे गुणी से अन्यत्र ले जाया जाता है, जैसे तृषा से पीड़ित (मृगतृष्णिका में) (जल के) आभास की ओर (ले जाते दीखते हैं)?