The Vision of Śiva· 4.105 / 124

The Vision of Śiva4.105

4.105
यत्र पूर्वापरौ शब्दौ कालैक्यं तत्र युज्यते । मनसा नीयते तस्य किं पदार्थस्वरूपता ॥१०५॥
yatra pūrvāparau śabdau kālaikyaṃ tatra yujyate | manasā nīyate tasya kiṃ padārthasvarūpatā
— जहाँ ; — पूर्व-अपर शब्द (वर्ण) ; — काल-एकता ; — वहाँ ; — संगत होती है ; — मन से ; — लाया जाता है ; — उसका ; — क्या ; — पदार्थ का (अपना) स्वरूप

जहाँ पूर्व-अपर शब्द (वर्ण) हैं, वहाँ काल-एकता संगत होती है; वह (समस्त) मन से (एकता में) लाया जाता है — किन्तु क्या वह (एकता) पदार्थ का (अपना) स्वरूप है (अथवा केवल चित् का व्यापार)?