यत्र पूर्वापरौ शब्दौ कालैक्यं तत्र युज्यते ।
मनसा नीयते तस्य किं पदार्थस्वरूपता ॥१०५॥
yatra pūrvāparau śabdau kālaikyaṃ tatra yujyate |
manasā nīyate tasya kiṃ padārthasvarūpatā
जहाँ पूर्व-अपर शब्द (वर्ण) हैं, वहाँ काल-एकता संगत होती है; वह (समस्त) मन से (एकता में) लाया जाता है — किन्तु क्या वह (एकता) पदार्थ का (अपना) स्वरूप है (अथवा केवल चित् का व्यापार)?