The Vision of Śiva· 3.83 / 99

The Vision of Śiva3.83

3.83
तथात्वेनैव कॢप्तत्वात्तदेतत्कल्पना भवेत् । तदेव तत्कल्पितं किं सत्ये नामास्तु कल्पना ॥८३॥
tathātvenaiva kḷptatvāttadetatkalpanā bhavet | tadeva tatkalpitaṃ kiṃ satye nāmāstu kalpanā
— वैसा ही (वस्तुतः) ; — कल्पित (निर्मित) होने के कारण ; — वह ; — यह ; — कल्पना होगी ; — वही (जगत्) ; — उस (शिव) रूप में कल्पित ; — क्यों ; — सत्य में ; — निश्चय ही ; — हो ; — कल्पना

क्योंकि वह वैसा ही (वस्तुतः) कल्पित (निर्मित) है, अतः वह यह (केवल द्वैतवादी मत में) कल्पना होगी; (किन्तु हमारे लिए) वही (जगत्) उस (शिव) के रूप में कल्पित है — तो सत्य में 'कल्पना' का प्रसंग ही क्यों हो? (न हो।)