तथात्वेनैव कॢप्तत्वात्तदेतत्कल्पना भवेत् ।
तदेव तत्कल्पितं किं सत्ये नामास्तु कल्पना ॥८३॥
tathātvenaiva kḷptatvāttadetatkalpanā bhavet |
tadeva tatkalpitaṃ kiṃ satye nāmāstu kalpanā
क्योंकि वह वैसा ही (वस्तुतः) कल्पित (निर्मित) है, अतः वह यह (केवल द्वैतवादी मत में) कल्पना होगी; (किन्तु हमारे लिए) वही (जगत्) उस (शिव) के रूप में कल्पित है — तो सत्य में 'कल्पना' का प्रसंग ही क्यों हो? (न हो।)