न पृथिव्यादिके तस्मिन् कल्पना संप्रवर्तते ॥८२॥
na pṛthivyādike tasmin kalpanā saṃpravartate
(अतएव) उस (शिव) में, जो पृथ्वी आदि (रूप) हो रहा है, कोई (मिथ्या) कल्पना प्रवृत्त नहीं होती।
(अतएव) उस (शिव) में, जो पृथ्वी आदि (रूप) हो रहा है, कोई (मिथ्या) कल्पना प्रवृत्त नहीं होती।