The Vision of Śiva· 3.84 / 99

The Vision of Śiva3.84

3.84
कटकेऽस्ति सुवर्णत्वं कुण्डले कल्पनास्ति किम् । चित्रवह्नावशोकादौ कल्पना राजते क्वचित् ॥८४॥
kaṭake'sti suvarṇatvaṃ kuṇḍale kalpanāsti kim | citravahnāvaśokādau kalpanā rājate kvacit
— कटक (कड़े) में ; — है ; — सुवर्णत्व ; — कुण्डल में ; — (मिथ्या) कल्पना ; — है ; — क्या ; — चित्रित अग्नि में ; — (चित्रित) अशोक आदि में ; — कल्पना ; — शोभती है ; — कहीं

कटक (कड़े) में सुवर्णत्व है; क्या कुण्डल में (मिथ्या) कल्पना है? (नहीं।) कल्पना कहीं (तभी) शोभती है — जैसे चित्रित अग्नि या (चित्रित) अशोक आदि में (जहाँ अग्नि और वृक्ष मिथ्या हैं; जगत् की सत्यता वैसी नहीं)।