The Vision of Śiva· 3.60 / 99

The Vision of Śiva3.60

3.60
अथ चित्रत्वमत्रास्ति भावपुञ्जे न तच्छिवे । शिवस्य तत्स्वरूपत्वं वैचित्र्यं यत्परस्परम् ॥६०॥
atha citratvamatrāsti bhāvapuñje na tacchive | śivasya tatsvarūpatvaṃ vaicitryaṃ yatparasparam
— अब ; — चित्रता (वैचित्र्य) ; — यहाँ ; — है ; — भाव-समूह में ; — नहीं ; — वह ; — शिव में ; — शिव का ; — वह (वैचित्र्य) ही स्वरूप ; — वैचित्र्य ; — जो ; — परस्पर

(आक्षेप:) अब यह चित्रता (वैचित्र्य) तो भाव-समूह में है, शिव में वह नहीं। (उत्तर:) शिव का वह (वैचित्र्य) ही स्वरूप है — वह वैचित्र्य जो (भावों में) परस्पर (होता है)।