अथ चित्रत्वमत्रास्ति भावपुञ्जे न तच्छिवे ।
शिवस्य तत्स्वरूपत्वं वैचित्र्यं यत्परस्परम् ॥६०॥
atha citratvamatrāsti bhāvapuñje na tacchive |
śivasya tatsvarūpatvaṃ vaicitryaṃ yatparasparam
(आक्षेप:) अब यह चित्रता (वैचित्र्य) तो भाव-समूह में है, शिव में वह नहीं। (उत्तर:) शिव का वह (वैचित्र्य) ही स्वरूप है — वह वैचित्र्य जो (भावों में) परस्पर (होता है)।