The Vision of Śiva· 3.61 / 99

The Vision of Śiva3.61

3.61
अपेक्ष्य भाववैचित्र्यं तस्य तेभ्यो विचित्रता । सर्वं शिवात्मकं यद्वत्कथनीयमिहाग्रतः ॥६१॥
apekṣya bhāvavaicitryaṃ tasya tebhyo vicitratā | sarvaṃ śivātmakaṃ yadvatkathanīyamihāgrataḥ
— अपेक्षा करके ; — भावों के वैचित्र्य की ; — उसकी ; — उनसे ; — विचित्रता ; — सब कुछ ; — शिवात्मक ; — जिस प्रकार ; — कहने योग्य ; — यहाँ ; — आगे

भावों के वैचित्र्य की अपेक्षा से उसकी (शिव की) विचित्रता उनसे (उत्पन्न होती) है; सब कुछ जिस प्रकार शिवात्मक है, वह यहाँ आगे कहने योग्य है।