The Vision of Śiva· 3.54 / 99

The Vision of Śiva3.54

3.54
निमित्तं कल्प्यते तत्र निमित्तं तत्र कल्प्यताम् । अतथात्वे तथाभावो यत्र स्यादथ चोद्यते ॥५४॥
nimittaṃ kalpyate tatra nimittaṃ tatra kalpyatām | atathātve tathābhāvo yatra syādatha codyate
— निमित्त ; — कल्पित किया जाता है ; — वहाँ ; — निमित्त ; — वहाँ ; — कल्पित किया जाए ; — अतथात्व (जो नहीं था) में ; — तथाभाव (वैसा हो जाना) ; — जहाँ ; — हो ; — तब ; — आक्षेप उठाया जाता है

जहाँ निमित्त की कल्पना (वास्तव में) की जाती है, वहाँ निमित्त की कल्पना कर लो — अर्थात् जहाँ अतथात्व (जो नहीं था) तथाभाव (वैसा हो जाता) हो, वहीं (आक्षेप किया जा सकता है); तभी आक्षेप उठाया जाता है (— किन्तु आत्म-समान शिव पर नहीं)।