The Vision of Śiva· 3.52 / 99

The Vision of Śiva3.52

3.52
यदि स्वरूपविभ्रंशाच्छाक्तरूपादिकल्पना । तद्वक्तव्यं निमित्तत्वं किमर्थं रूपमूज्झति ॥५२॥
yadi svarūpavibhraṃśācchāktarūpādikalpanā | tadvaktavyaṃ nimittatvaṃ kimarthaṃ rūpamūjjhati
— यदि ; — स्वरूप के विभ्रंश (पतन) से ; — शाक्त-रूप आदि की कल्पना ; — तो ; — बतलाना पड़ेगा ; — निमित्तत्व (कारण) ; — किसलिए ; — रूप को ; — त्यागता है

यदि स्वरूप के विभ्रंश (पतन) से शाक्त-रूप आदि की कल्पना (होती है), तो निमित्तत्व (कारण) बतलाना पड़ेगा — किसलिए वह (अपने) रूप को त्यागता है?