यदि स्वरूपविभ्रंशाच्छाक्तरूपादिकल्पना ।
तद्वक्तव्यं निमित्तत्वं किमर्थं रूपमूज्झति ॥५२॥
yadi svarūpavibhraṃśācchāktarūpādikalpanā |
tadvaktavyaṃ nimittatvaṃ kimarthaṃ rūpamūjjhati
यदि स्वरूप के विभ्रंश (पतन) से शाक्त-रूप आदि की कल्पना (होती है), तो निमित्तत्व (कारण) बतलाना पड़ेगा — किसलिए वह (अपने) रूप को त्यागता है?