The Vision of Śiva· 3.46 / 99

The Vision of Śiva3.46

3.46
तथैव स्यादथोच्येत वह्नेः संस्कारचोदना । शास्त्रेषु वर्णिता कस्मात्कार्यार्थं कार्यमेव तत् ॥४६॥
tathaiva syādathocyeta vahneḥ saṃskāracodanā | śāstreṣu varṇitā kasmātkāryārthaṃ kāryameva tat
— वैसा ही ; — होगा ; — अब (यदि) ; — कहा जाए ; — अग्नि के ; — संस्कार का विधान ; — शास्त्रों में ; — वर्णित ; — क्यों ; — प्रयोजन के लिए ; — कार्य-मात्र (उपायमात्र) ; — वह

वैसा ही (सबमें) होगा। अब यदि कहा जाए कि शास्त्रों में अग्नि के संस्कार का विधान क्यों वर्णित है — (तो उत्तर) वह तो (व्यावहारिक) प्रयोजन के लिए, कार्य-मात्र (उपायमात्र) है।