तथैव स्यादथोच्येत वह्नेः संस्कारचोदना ।
शास्त्रेषु वर्णिता कस्मात्कार्यार्थं कार्यमेव तत् ॥४६॥
tathaiva syādathocyeta vahneḥ saṃskāracodanā |
śāstreṣu varṇitā kasmātkāryārthaṃ kāryameva tat
वैसा ही (सबमें) होगा। अब यदि कहा जाए कि शास्त्रों में अग्नि के संस्कार का विधान क्यों वर्णित है — (तो उत्तर) वह तो (व्यावहारिक) प्रयोजन के लिए, कार्य-मात्र (उपायमात्र) है।