स्थितमेव न हेम्नोऽस्य काचिदस्ति विभेदिता ।
चण्डालसद्मगो वह्निर्न वह्निरिति कथ्यते ॥४५॥
sthitameva na hemno'sya kācidasti vibheditā |
caṇḍālasadmago vahnirna vahniriti kathyate
इस सोने का सुवर्णत्व वैसा ही स्थित रहता है, उसमें कोई विभेदता नहीं; चण्डाल के घर में स्थित अग्नि को 'अग्नि नहीं' — ऐसा नहीं कहा जाता।