The Vision of Śiva· 3.45 / 99

The Vision of Śiva3.45

3.45
स्थितमेव न हेम्नोऽस्य काचिदस्ति विभेदिता । चण्डालसद्मगो वह्निर्न वह्निरिति कथ्यते ॥४५॥
sthitameva na hemno'sya kācidasti vibheditā | caṇḍālasadmago vahnirna vahniriti kathyate
— वैसा ही स्थित ; — नहीं ; — इस सोने की ; — कोई है ; — विभेदता ; — चण्डाल के घर में स्थित ; — अग्नि ; — नहीं ; — 'अग्नि' ; — ऐसा ; — कहा जाता

इस सोने का सुवर्णत्व वैसा ही स्थित रहता है, उसमें कोई विभेदता नहीं; चण्डाल के घर में स्थित अग्नि को 'अग्नि नहीं' — ऐसा नहीं कहा जाता।