अभग्ने स्वस्य रूपत्वे शुद्धन्यूनादिकं कुतः ।
पतद्ग्रहादिके हेम्नि हेमत्वं मुकुटादिके ॥४४॥
abhagne svasya rūpatve śuddhanyūnādikaṃ kutaḥ |
patadgrahādike hemni hematvaṃ mukuṭādike
जब अपना रूप अभग्न (अखण्डित) है, तो शुद्धि, न्यूनता आदि कहाँ से? पतद्ग्रह (थूकदान) आदि के सोने में जो सुवर्णत्व है, वही मुकुट आदि में (है)।