The Vision of Śiva· 3.44 / 99

The Vision of Śiva3.44

3.44
अभग्ने स्वस्य रूपत्वे शुद्धन्यूनादिकं कुतः । पतद्ग्रहादिके हेम्नि हेमत्वं मुकुटादिके ॥४४॥
abhagne svasya rūpatve śuddhanyūnādikaṃ kutaḥ | patadgrahādike hemni hematvaṃ mukuṭādike
— अभग्न (अखण्डित) होने पर ; — अपना ; — रूप ; — शुद्धि, न्यूनता आदि ; — कहाँ से ; — पतद्ग्रह (थूकदान) आदि में ; — सोने में ; — सुवर्णत्व ; — मुकुट आदि में

जब अपना रूप अभग्न (अखण्डित) है, तो शुद्धि, न्यूनता आदि कहाँ से? पतद्ग्रह (थूकदान) आदि के सोने में जो सुवर्णत्व है, वही मुकुट आदि में (है)।