The Vision of Śiva· 3.47 / 99

The Vision of Śiva3.47

3.47
न स्वरूपविभागोऽत्र तथा तस्य व्यवस्थितेः । संज्ञाकरणमात्रं तद्व्यवहाराय कल्पितम् ॥४७॥
na svarūpavibhāgo'tra tathā tasya vyavasthiteḥ | saṃjñākaraṇamātraṃ tadvyavahārāya kalpitam
— नहीं ; — स्वरूप का विभाग ; — यहाँ ; — वैसी ; — उसकी ; — व्यवस्था (अखण्ड स्थिति) होने के कारण ; — केवल संज्ञा-करण मात्र ; — वह ; — व्यवहार के लिए ; — कल्पित

यहाँ स्वरूप का विभाग नहीं, क्योंकि उसकी (शिव की) वैसी ही व्यवस्था (अखण्ड स्थिति) है; (भेद तो) केवल संज्ञा-करण मात्र है, जो व्यवहार के लिए कल्पित है।