न स्वरूपविभागोऽत्र तथा तस्य व्यवस्थितेः ।
संज्ञाकरणमात्रं तद्व्यवहाराय कल्पितम् ॥४७॥
na svarūpavibhāgo'tra tathā tasya vyavasthiteḥ |
saṃjñākaraṇamātraṃ tadvyavahārāya kalpitam
यहाँ स्वरूप का विभाग नहीं, क्योंकि उसकी (शिव की) वैसी ही व्यवस्था (अखण्ड स्थिति) है; (भेद तो) केवल संज्ञा-करण मात्र है, जो व्यवहार के लिए कल्पित है।