The Vision of Śiva· 3.48 / 99

The Vision of Śiva3.48

3.48
व्यवहारोऽप्यविद्या नो तथात्वेनेश्वरस्थितिः । तेनैव वा तथा कॢप्तस्तथा तदनुवर्तनम् ॥४८॥
vyavahāro'pyavidyā no tathātveneśvarasthitiḥ | tenaiva vā tathā kḷptastathā tadanuvartanam
— व्यवहार भी ; — हमारे लिए अविद्या नहीं ; — उसी रूप में ; — ईश्वर की स्थिति ; — उसी (शिव) द्वारा ; — अथवा ; — वैसा ; — रचा गया ; — तदनुसार ; — उसका अनुवर्तन

हमारे लिए व्यवहार भी अविद्या नहीं; वह (व्यवहार) उसी रूप में ईश्वर की स्थिति है; अथवा उसी (शिव) द्वारा वह वैसा रचा गया है, और तदनुसार उसका अनुवर्तन (होता है)।