The Vision of Śiva· 3.39 / 99

The Vision of Śiva3.39

3.39
निश्चलत्वेऽपि हि जलं वीचित्वे जलमेव तत् । वीचिभिस्तद्विशिष्टं चेत्तन्नैश्चल्यविशेषकम् ॥३९॥
niścalatve'pi hi jalaṃ vīcitve jalameva tat | vīcibhistadviśiṣṭaṃ cettannaiścalyaviśeṣakam
— निश्चलता में भी ; — निश्चय ही ; — जल ; — तरंग-अवस्था में ; — जल ही ; — वह ; — तरंगों से ; — वह (जल) विशिष्ट ; — यदि ; — वही (तरंगितता) निश्चलता से विशिष्ट करने वाली

क्योंकि निश्चलता में भी जल (जल है), और तरंग-अवस्था में भी वह जल ही है; यदि (कहो कि) वह तरंगों से विशिष्ट है — तो वही (तरंगितता) उसे निश्चलता से विशिष्ट करने वाली है (पर उसका जल-स्वरूप अक्षुण्ण रहता है)।