तत्र विचित्वमापन्नं न जलं जलमुच्यते ।
न च तत्राम्बुरूपस्य वीचिकाले विनाशिता ॥३८॥
tatra vicitvamāpannaṃ na jalaṃ jalamucyate |
na ca tatrāmburūpasya vīcikāle vināśitā
वहाँ जो जल तरंगितता (लहर-रूप) को प्राप्त हुआ, वह (तब) 'जल' नहीं कहा जाता; फिर भी वहाँ तरंग के समय जल-रूप का विनाश नहीं होता।