The Vision of Śiva· 3.38 / 99

The Vision of Śiva3.38

3.38
तत्र विचित्वमापन्नं न जलं जलमुच्यते । न च तत्राम्बुरूपस्य वीचिकाले विनाशिता ॥३८॥
tatra vicitvamāpannaṃ na jalaṃ jalamucyate | na ca tatrāmburūpasya vīcikāle vināśitā
— वहाँ ; — तरंगितता (लहर-रूप) को ; — प्राप्त ; — नहीं ; — जल ; — 'जल' ; — कहा जाता ; — और नहीं ; — वहाँ ; — जल-रूप का ; — तरंग के समय ; — विनाश

वहाँ जो जल तरंगितता (लहर-रूप) को प्राप्त हुआ, वह (तब) 'जल' नहीं कहा जाता; फिर भी वहाँ तरंग के समय जल-रूप का विनाश नहीं होता।