विभागस्तद्वदीशस्य मध्योत्कृष्टनिकृष्टकैः ।
भावैर्नास्ति विभेदत्वमथवाम्बुधिवीचिवत् ॥३७॥
vibhāgastadvadīśasya madhyotkṛṣṭanikṛṣṭakaiḥ |
bhāvairnāsti vibhedatvamathavāmbudhivīcivat
— वैसे ही ईश का मध्यम, उत्कृष्ट और निकृष्ट भावों के द्वारा (वास्तविक) विभाग नहीं; (उसमें) विभेदता नहीं है। अथवा समुद्र और तरंग के समान (समझो)।