The Vision of Śiva· 3.35 / 99

The Vision of Śiva3.35

3.35
इच्छया सर्वभावत्वमनेकात्मत्वमेव च । नात्र स्वात्मविकारेण जनयेद्भावमण्डलम् ॥३५॥
icchayā sarvabhāvatvamanekātmatvameva ca | nātra svātmavikāreṇa janayedbhāvamaṇḍalam
— इच्छा से ; — सर्व-भावत्व ; — और अनेकात्मत्व ही ; — नहीं ; — यहाँ ; — अपने आत्मा के विकार से ; — उत्पन्न करता ; — भाव-मण्डल को

इच्छा से (वह) सर्व-भावत्व और अनेकात्मत्व (को धारण करता है); (किन्तु) वह यहाँ अपने आत्मा के (वास्तविक) विकार से भाव-मण्डल को उत्पन्न नहीं करता।