इच्छावत्कार्यनिष्पत्त्या पुनरिच्छान्तरोद्गमे ।
शिवस्य हेतुर्वक्तव्यो यदर्थं सा नवोद्गता ॥३१॥
icchāvatkāryaniṣpattyā punaricchāntarodgame |
śivasya heturvaktavyo yadarthaṃ sā navodgatā
(आक्षेप:) इच्छावान् होने से एक कार्य की निष्पत्ति के बाद पुनः दूसरी इच्छा के उद्गम में शिव का हेतु बतलाना पड़ेगा — कि वह नई (इच्छा) किस प्रयोजन से उठी।