एवं सति समग्रस्य व्यवहारस्य भङ्गिता ।
तथैवं संप्रवृत्तौ तु निमित्तकलनापतेत् ॥२५॥
evaṃ sati samagrasya vyavahārasya bhaṅgitā |
tathaivaṃ saṃpravṛttau tu nimittakalanāpatet
(आक्षेप:) ऐसा होने पर समग्र व्यवहार का भंग हो जाता है; और इसी प्रकार (सृष्टि के) सम्यक् प्रवर्तन में निमित्त (कारण) की कल्पना (असंगत रूप से) आ पड़ेगी।