The Vision of Śiva· 2.87 / 90

The Vision of Śiva2.87

2.87
स्थिता सा न पुनः सत्या वाचो वायुगमात्मनः । इष्यते ब्रह्मरूपत्वं घटादेरपि कथ्यताम् ॥८७॥
sthitā sā na punaḥ satyā vāco vāyugamātmanaḥ | iṣyate brahmarūpatvaṃ ghaṭāderapi kathyatām
— स्थित ; — वह ; — किन्तु नहीं ; — सत्य (परम-रूप में) ; — वाक् की ; — वायु-गमन-स्वरूप की ; — इष्ट है ; — ब्रह्म-रूपता ; — घट आदि की भी ; — कहो

वह (पश्यन्ती) स्थित तो है, किन्तु पुनः वायु-गमन-स्वरूप वाक् की सत्यता (परम-रूप में) नहीं; (यदि) ब्रह्म-रूपता (वाक् को) इष्ट है, तो घट आदि को भी कहो (क्यों नहीं)।