The Vision of Śiva· 2.85 / 90

The Vision of Śiva2.85

2.85
सा स्थिता पूर्वतस्तस्या इच्छायाः प्रसरः कथम् । यावन्न सूक्ष्म उल्लासश्चितः कार्योन्मुखः स्थितः ॥८५॥
sā sthitā pūrvatastasyā icchāyāḥ prasaraḥ katham | yāvanna sūkṣma ullāsaścitaḥ kāryonmukhaḥ sthitaḥ
— वह (पूर्व-भाग रूप पश्यन्ती) ; — स्थित ; — पूर्व रूप में ; — उसकी ; — इच्छा का ; — प्रसार ; — कैसे ; — जब तक ; — नहीं ; — सूक्ष्म ; — उल्लास ; — चित् का ; — कार्य की ओर उन्मुख ; — स्थित

वह (पश्यन्ती) पूर्व रूप में स्थित है; (किन्तु) उसकी इच्छा का प्रसार कैसे (हो), जब तक कार्य की ओर उन्मुख चित् का सूक्ष्म उल्लास स्थित न हो?