The Vision of Śiva· 2.84 / 90

The Vision of Śiva2.84

2.84
यथा कर्तुः कुलालादेर्घटः कार्य इतीदृशः । विमर्श इच्छारूपेण तद्वदत्रापि संस्थितम् ॥८४॥
yathā kartuḥ kulālāderghaṭaḥ kārya itīdṛśaḥ | vimarśa icchārūpeṇa tadvadatrāpi saṃsthitam
— जैसे ; — कर्ता का ; — कुम्भकार आदि का ; — घट ; — बनाने योग्य ; — इस प्रकार ; — ऐसा ; — विमर्श ; — इच्छा-रूप से ; — वैसे ही ; — यहाँ भी ; — स्थित है

जैसे कुम्भकार आदि कर्ता का 'घट बनाने योग्य है' — इस प्रकार का विमर्श इच्छा-रूप से (होता है), वैसे ही यहाँ भी (पश्यन्ती में) यह स्थित है।