यथा कर्तुः कुलालादेर्घटः कार्य इतीदृशः ।
विमर्श इच्छारूपेण तद्वदत्रापि संस्थितम् ॥८४॥
yathā kartuḥ kulālāderghaṭaḥ kārya itīdṛśaḥ |
vimarśa icchārūpeṇa tadvadatrāpi saṃsthitam
जैसे कुम्भकार आदि कर्ता का 'घट बनाने योग्य है' — इस प्रकार का विमर्श इच्छा-रूप से (होता है), वैसे ही यहाँ भी (पश्यन्ती में) यह स्थित है।