यस्मादनादिनिधनं शब्दतत्त्वं परा हि वाक् ।
पश्यन्त्या वर्ण्यमानत्वे हस्ते ग्राह्यैकता पतेत् ॥८२॥
yasmādanādinidhanaṃ śabdatattvaṃ parā hi vāk |
paśyantyā varṇyamānatve haste grāhyaikatā patet
क्योंकि (तुम) अनादि-निधन शब्द-तत्त्व को परा वाक् (मानते हो) — किन्तु (इस प्रकार) वर्णित किए जाने पर वह, जैसे हाथ में (वस्तु आती है, वैसे) ग्राह्य-वस्तु के साथ एकता में पड़ जाती है (और अपना परम स्वरूप खो देती है)।