The Vision of Śiva· 2.82 / 90

The Vision of Śiva2.82

2.82
यस्मादनादिनिधनं शब्दतत्त्वं परा हि वाक् । पश्यन्त्या वर्ण्यमानत्वे हस्ते ग्राह्यैकता पतेत् ॥८२॥
yasmādanādinidhanaṃ śabdatattvaṃ parā hi vāk | paśyantyā varṇyamānatve haste grāhyaikatā patet
— क्योंकि ; — अनादि-निधन ; — शब्द-तत्त्व ; — परा वाक् (मानते हो) ; — पश्यन्ती की ; — वर्णित किए जाने पर ; — हाथ में ; — ग्राह्य (वस्तु) के साथ एकता ; — आ पड़ती है

क्योंकि (तुम) अनादि-निधन शब्द-तत्त्व को परा वाक् (मानते हो) — किन्तु (इस प्रकार) वर्णित किए जाने पर वह, जैसे हाथ में (वस्तु आती है, वैसे) ग्राह्य-वस्तु के साथ एकता में पड़ जाती है (और अपना परम स्वरूप खो देती है)।