हस्तादेः करणत्वं हि मस्तकादेश्च कर्मता ।
कर्ता मनः स्वावयवी नामूर्ताया इदं पुनः ॥५४॥
hastādeḥ karaṇatvaṃ hi mastakādeśca karmatā |
kartā manaḥ svāvayavī nāmūrtāyā idaṃ punaḥ
क्योंकि हाथ आदि का करणत्व है, और मस्तक आदि का कर्मत्व; कर्ता मन है, (और देवदत्त) अपने अवयवों वाला (अवयवी) है; किन्तु अमूर्त (पश्यन्ती) में यह (त्रिविध विभाग) नहीं (बन सकता)।