The Vision of Śiva· 2.54 / 90

The Vision of Śiva2.54

2.54
हस्तादेः करणत्वं हि मस्तकादेश्च कर्मता । कर्ता मनः स्वावयवी नामूर्ताया इदं पुनः ॥५४॥
hastādeḥ karaṇatvaṃ hi mastakādeśca karmatā | kartā manaḥ svāvayavī nāmūrtāyā idaṃ punaḥ
— हाथ आदि का ; — करणत्व ; — निश्चय ही ; — मस्तक आदि का ; — और ; — कर्मत्व ; — कर्ता ; — मन ; — अपने अवयवों वाला (अवयवी) ; — नहीं ; — अमूर्त (पश्यन्ती) में ; — यह ; — किन्तु

क्योंकि हाथ आदि का करणत्व है, और मस्तक आदि का कर्मत्व; कर्ता मन है, (और देवदत्त) अपने अवयवों वाला (अवयवी) है; किन्तु अमूर्त (पश्यन्ती) में यह (त्रिविध विभाग) नहीं (बन सकता)।