The Vision of Śiva· 2.53 / 90

The Vision of Śiva2.53

2.53
आत्मानमात्मना हन्ति देवदत्तो यथा यथा । भविष्यत्यत्र तत्रास्य स्वाङ्गैरेव विभागिता ॥५३॥
ātmānamātmanā hanti devadatto yathā yathā | bhaviṣyatyatra tatrāsya svāṅgaireva vibhāgitā
— अपने को ; — अपने से ; — मारता है ; — देवदत्त ; — जैसे-जैसे ; — होगी ; — यहाँ ; — वहाँ ; — उसकी ; — अपने ही अंगों से ; — विभागिता

जैसे देवदत्त अपने को अपने से ही मारता है, वहाँ इधर-उधर उसके अपने ही अंगों से विभागिता होती है (— वैसे ही पश्यन्ती के स्व-दर्शन में भी आन्तरिक विभाग अपेक्षित है)।