The Vision of Śiva· 2.52 / 90

The Vision of Śiva2.52

2.52
अथात्मना सा स्वात्मानं पश्यन्ती निर्विभागशः । भागे करणरूपत्वात्पारतन्त्र्यं जडात्मता ॥५२॥
athātmanā sā svātmānaṃ paśyantī nirvibhāgaśaḥ | bhāge karaṇarūpatvātpāratantryaṃ jaḍātmatā
— अब ; — अपने आत्मा से ; — वह ; — अपने आत्मा को ; — देखती हुई ; — निर्विभाग रूप से ; — (द्रष्टा) भाग में ; — करण-रूप होने के कारण ; — पारतन्त्र्य ; — जड़-स्वरूपता

अब यदि वह अपने ही आत्मा से अपने आत्मा को निर्विभाग रूप से देखती है — तो (उसके द्रष्टा) भाग में, करण-रूप होने के कारण, पारतन्त्र्य और जड़ता (आ जाती है)।