आत्मनः सक्रमत्वं स्यादन्यत्रापरसंगमः ।
किं पूर्वं सक्रमाभूत्सा रूपद्वित्वं प्रसज्यते ॥५१॥
ātmanaḥ sakramatvaṃ syādanyatrāparasaṃgamaḥ |
kiṃ pūrvaṃ sakramābhūtsā rūpadvitvaṃ prasajyate
(अपने में तो) उसका सक्रमत्व (क्रमयुक्तता) होगा; अन्यत्र (होने पर) अन्य के साथ संगम (आएगा)। और क्या वह पहले सक्रम थी? (तब) उसके रूप का द्वित्व प्रसक्त होता है।