The Vision of Śiva· 2.51 / 90

The Vision of Śiva2.51

2.51
आत्मनः सक्रमत्वं स्यादन्यत्रापरसंगमः । किं पूर्वं सक्रमाभूत्सा रूपद्वित्वं प्रसज्यते ॥५१॥
ātmanaḥ sakramatvaṃ syādanyatrāparasaṃgamaḥ | kiṃ pūrvaṃ sakramābhūtsā rūpadvitvaṃ prasajyate
— अपना ; — सक्रमत्व (क्रमयुक्तता) ; — होगा ; — अन्यत्र ; — अन्य के साथ संगम ; — क्या ; — पहले ; — सक्रम ; — थी ; — वह ; — रूप का द्वित्व ; — प्रसक्त होता है

(अपने में तो) उसका सक्रमत्व (क्रमयुक्तता) होगा; अन्यत्र (होने पर) अन्य के साथ संगम (आएगा)। और क्या वह पहले सक्रम थी? (तब) उसके रूप का द्वित्व प्रसक्त होता है।