पश्यन्त्या दर्शनं दृष्टे न च वा ह्युपपद्यते ॥५५॥
paśyantyā darśanaṃ dṛṣṭe na ca vā hyupapadyate
चाहे (विषय के) दृष्ट होने पर हो, अथवा (कुछ भी दृष्ट न होने पर) — पश्यन्ती का 'दर्शन' किसी भी प्रकार संगत नहीं होता।
चाहे (विषय के) दृष्ट होने पर हो, अथवा (कुछ भी दृष्ट न होने पर) — पश्यन्ती का 'दर्शन' किसी भी प्रकार संगत नहीं होता।