The Vision of Śiva· 2.56 / 90

The Vision of Śiva2.56

2.56
पश्यन्तं सा किमात्मानं पश्यन्ती जडमेव वा । जडे जडत्वमेवास्याः पश्यतो ह्यनवस्थता ॥५६॥
paśyantaṃ sā kimātmānaṃ paśyantī jaḍameva vā | jaḍe jaḍatvamevāsyāḥ paśyato hyanavasthatā
— द्रष्टा को ; — वह ; — क्या ; — अपने को ; — देखती हुई ; — जड़-मात्र ; — अथवा ; — जड़ (विषय) होने पर ; — जड़त्व ही ; — उसके लिए ; — द्रष्टा को देखने वाले की ; — निश्चय ही ; — अनवस्था

क्या वह देखती हुई अपने को द्रष्टा रूप में देखती है, अथवा जड़-मात्र रूप में? जड़ (विषय) होने पर तो उसी में जड़त्व (आता है); और (अपने को) द्रष्टा (देखती हुई द्रष्टा को देखने में) अनवस्था (दोष आता है)।