पश्यन्तं सा किमात्मानं पश्यन्ती जडमेव वा ।
जडे जडत्वमेवास्याः पश्यतो ह्यनवस्थता ॥५६॥
paśyantaṃ sā kimātmānaṃ paśyantī jaḍameva vā |
jaḍe jaḍatvamevāsyāḥ paśyato hyanavasthatā
क्या वह देखती हुई अपने को द्रष्टा रूप में देखती है, अथवा जड़-मात्र रूप में? जड़ (विषय) होने पर तो उसी में जड़त्व (आता है); और (अपने को) द्रष्टा (देखती हुई द्रष्टा को देखने में) अनवस्था (दोष आता है)।