किंञ्चित्पश्यति वा सूक्ष्मं तदस्मद्दर्शनान्वयः ।
कर्मत्वे पारतन्त्र्यं स्यात्तस्या एव निजात्मनि ॥५७॥
kiṃñcitpaśyati vā sūkṣmaṃ tadasmaddarśanānvayaḥ |
karmatve pāratantryaṃ syāttasyā eva nijātmani
अथवा (यदि कहो कि) वह कोई सूक्ष्म वस्तु देखती है — तो वह हमारे दर्शन के ही अनुकूल है; (किन्तु यदि वह स्वयं) कर्म (विषय) बनती है, तो अपने ही आत्मा के विषय में उसको पारतन्त्र्य (आता है)।