The Vision of Śiva· 2.57 / 90

The Vision of Śiva2.57

2.57
किंञ्चित्पश्यति वा सूक्ष्मं तदस्मद्दर्शनान्वयः । कर्मत्वे पारतन्त्र्यं स्यात्तस्या एव निजात्मनि ॥५७॥
kiṃñcitpaśyati vā sūkṣmaṃ tadasmaddarśanānvayaḥ | karmatve pāratantryaṃ syāttasyā eva nijātmani
— कुछ ; — देखती है ; — अथवा ; — सूक्ष्म ; — वह ; — हमारे दर्शन के अनुकूल ; — कर्म (विषय) होने पर ; — पारतन्त्र्य ; — होगा ; — उसी का ही ; — अपने आत्मा के विषय में

अथवा (यदि कहो कि) वह कोई सूक्ष्म वस्तु देखती है — तो वह हमारे दर्शन के ही अनुकूल है; (किन्तु यदि वह स्वयं) कर्म (विषय) बनती है, तो अपने ही आत्मा के विषय में उसको पारतन्त्र्य (आता है)।