सत्यैव यदि विद्यानामभावस्तर्हि शून्यता ।
शून्यया बाध्यते चित्रं पश्यन्ती दर्शनात्मिका ॥३५॥
satyaiva yadi vidyānāmabhāvastarhi śūnyatā |
śūnyayā bādhyate citraṃ paśyantī darśanātmikā
यदि विद्या सत्य ही है, फिर भी (तुम उसे) अभाव (बना देते हो), तो वह शून्यता हो जाएगी; और — कैसा आश्चर्य! — दर्शन-स्वरूपा पश्यन्ती उस शून्य से बाधित हो जाएगी।