सत्या वा स्यादसत्या वा न मध्यायाः समन्वयः ।
विद्या न भवतीत्येवं तत्तल्या काचिदापतेत् ॥३४॥
satyā vā syādasatyā vā na madhyāyāḥ samanvayaḥ |
vidyā na bhavatītyevaṃ tattalyā kācidāpatet
वह या तो सत्य होगी या असत्य; (पश्यन्ती के) मध्य (तीसरे पक्ष) का कोई समन्वय नहीं। और 'यहाँ विद्या (ज्ञान) है ही नहीं' — ऐसा (कहने पर) उसके तुल्य कोई (दोष तुम्हारे मत पर भी) आ पड़ेगा।