The Vision of Śiva· 2.34 / 90

The Vision of Śiva2.34

2.34
सत्या वा स्यादसत्या वा न मध्यायाः समन्वयः । विद्या न भवतीत्येवं तत्तल्या काचिदापतेत् ॥३४॥
satyā vā syādasatyā vā na madhyāyāḥ samanvayaḥ | vidyā na bhavatītyevaṃ tattalyā kācidāpatet
— सत्य ; — या ; — होगी ; — असत्य ; — या ; — (पश्यन्ती के) मध्य का नहीं ; — समन्वय ; — विद्या ; — नहीं है ; — ऐसा ; — उसके तुल्य ; — कोई ; — आ पड़ेगी

वह या तो सत्य होगी या असत्य; (पश्यन्ती के) मध्य (तीसरे पक्ष) का कोई समन्वय नहीं। और 'यहाँ विद्या (ज्ञान) है ही नहीं' — ऐसा (कहने पर) उसके तुल्य कोई (दोष तुम्हारे मत पर भी) आ पड़ेगा।