स्वधर्मत्वेऽस्या मालिन्यं परधर्मेऽपि कस्य सा ।
परस्य शास्त्रानिष्टस्य स्वतन्त्रा वा तथापि सा ॥२९॥
svadharmatve'syā mālinyaṃ paradharme'pi kasya sā |
parasya śāstrāniṣṭasya svatantrā vā tathāpi sā
स्वधर्म होने पर तो उसमें मालिन्य (आता है); और परधर्म होने पर भी वह किसकी? क्योंकि ऐसा 'पर' तो (तुम्हारे) शास्त्र को अनिष्ट है; अथवा वह स्वतन्त्र (होगी) — किन्तु तब भी वह (असंगत ही रहती है)।