The Vision of Śiva· 1.5 / 49

The Vision of Śiva1.5

1.5
न परं तदवस्थायां व्यवस्थैषा व्यवस्थिता । यावत्समग्रज्ञानाग्रज्ञातृस्पर्शदशास्वपि ॥५॥
na paraṃ tadavasthāyāṃ vyavasthaiṣā vyavasthitā | yāvatsamagrajñānāgrajñātṛsparśadaśāsvapi
— नहीं ; — आगे, परे ; — उस अवस्था में ; — यह व्यवस्था (तीन शक्तियों की निश्चित विभक्ति) ; — यह ; — व्यवस्थित, ठहरी हुई ; — जहाँ तक, यहाँ तक कि ; — समग्र ज्ञान के अग्रभाग पर ज्ञाता के स्पर्श की दशाओं में ; — भी

उस अवस्था में यह (तीन शक्तियों की) व्यवस्था आगे नहीं ठहरती — यहाँ तक कि समग्र ज्ञान के अग्रभाग पर ज्ञाता के स्पर्श की दशाओं में भी (नहीं)।