The Vision of Śiva· 1.47 / 49

The Vision of Śiva1.47

1.47
नीरूपता निर्वृतिर्वा शक्तित्रितययोगिता । सचित्वं संस्थितं नित्यं कथनीयं तथाग्रतः ॥४७॥
nīrūpatā nirvṛtirvā śaktitritayayogitā | sacitvaṃ saṃsthitaṃ nityaṃ kathanīyaṃ tathāgrataḥ
— नीरूपता (रूप-रहितता) ; — निर्वृति ; — अथवा ; — शक्ति-त्रय की योगिता ; — सचित्व (चैतन्ययुक्तता) ; — संस्थित ; — नित्य ; — कहने योग्य ; — उसी प्रकार ; — आगे

— (चाहे वह) नीरूपता हो, निर्वृति हो, अथवा शक्ति-त्रय की योगिता हो — सचित्व (चैतन्ययुक्तता) नित्य संस्थित है; यह आगे कहने योग्य है।