स यदास्ते चिदाह्लादमात्रानुभवतल्लयः ।
तदिच्छा तावती तावज्ज्ञानं तावत्क्रिया हि सा ॥३॥
sa yadāste cidāhlādamātrānubhavatallayaḥ |
tadicchā tāvatī tāvajjñānaṃ tāvatkriyā hi sā
जब वह केवल चित् के आह्लाद-मात्र के अनुभव में लीन होकर स्थित रहता है, तब उसकी इच्छा उतनी ही है, ज्ञान उतना ही है, और वही उसकी क्रिया है।