The Vision of Śiva· 1.3 / 49

The Vision of Śiva1.3

1.3
स यदास्ते चिदाह्लादमात्रानुभवतल्लयः । तदिच्छा तावती तावज्ज्ञानं तावत्क्रिया हि सा ॥३॥
sa yadāste cidāhlādamātrānubhavatallayaḥ | tadicchā tāvatī tāvajjñānaṃ tāvatkriyā hi sā
— वह ; — जब ; — स्थित रहता है, रहता है ; — केवल चित् के आह्लाद-मात्र के अनुभव में लीन ; — उसकी इच्छा ; — उतनी ही ; — ज्ञान ; — क्रिया ; — निश्चय ही ; — वह

जब वह केवल चित् के आह्लाद-मात्र के अनुभव में लीन होकर स्थित रहता है, तब उसकी इच्छा उतनी ही है, ज्ञान उतना ही है, और वही उसकी क्रिया है।