आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः ।
अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः ॥२॥
ātmaiva sarvabhāveṣu sphurannirvṛtacidvibhuḥ |
aniruddhecchāprasaraḥ prasaraddṛkkriyaḥ śivaḥ
आत्मा ही समस्त भावों में स्फुरित होता हुआ शिव है — वह सर्वव्यापी प्रभु जिसका चैतन्य निर्वृत (आनन्दमय विश्रान्ति) है, जिसकी इच्छा का प्रसार अनिरुद्ध है, तथा जिसकी दृक् और क्रिया की शक्तियाँ स्वच्छन्द रूप से प्रसरित होती हैं।