The Vision of Śiva· 1.2 / 49

The Vision of Śiva1.2

1.2
आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः ॥२॥
ātmaiva sarvabhāveṣu sphurannirvṛtacidvibhuḥ | aniruddhecchāprasaraḥ prasaraddṛkkriyaḥ śivaḥ
— आत्मा ; — ही, निश्चय ही ; — समस्त भावों में ; — स्फुरित होता हुआ, चमकता हुआ ; — वह सर्वव्यापी प्रभु जिसका चैतन्य निर्वृत (आनन्द-विश्रान्ति) है ; — जिसकी इच्छा का प्रसार अनिरुद्ध है ; — जिसकी दृक् और क्रिया प्रसरित होती हैं ; — शिव

आत्मा ही समस्त भावों में स्फुरित होता हुआ शिव है — वह सर्वव्यापी प्रभु जिसका चैतन्य निर्वृत (आनन्दमय विश्रान्ति) है, जिसकी इच्छा का प्रसार अनिरुद्ध है, तथा जिसकी दृक् और क्रिया की शक्तियाँ स्वच्छन्द रूप से प्रसरित होती हैं।