The Vision of Śiva· 1.28 / 49

The Vision of Śiva1.28

1.28
न्यायादिभिर्न तुल्यत्वं तैर्हि या प्राकृती मतिः । तस्या एवात्मधर्मत्वमिष्टं न परबोधके ॥२८॥
nyāyādibhirna tulyatvaṃ tairhi yā prākṛtī matiḥ | tasyā evātmadharmatvamiṣṭaṃ na parabodhake
— न्याय आदि (दर्शनों) से ; — नहीं ; — तुल्यता ; — उनके द्वारा ; — क्योंकि ; — जो ; — प्राकृत (प्रकृति-जन्य) ; — बुद्धि ; — उसी का ; — ही ; — आत्म-धर्मत्व (जीवात्मा का गुण होना) ; — अभीष्ट ; — नहीं ; — परबोधक (परम ज्ञाता) में

न्याय आदि (दर्शनों) से (इसकी) तुल्यता नहीं; क्योंकि उनके द्वारा (मानी गई) जो प्राकृत बुद्धि है, उसी का आत्म-धर्मत्व (जीवात्मा का गुण होना) अभीष्ट है, न कि परबोधक (परम ज्ञाता) में।