औन्मुख्याभावतस्तस्य निवृत्तिर्निर्वृतिं विना ।
द्वेष्ये प्रवर्तते नैव न च वेत्ति विना चितम् ॥२५॥
aunmukhyābhāvatastasya nivṛttirnirvṛtiṃ vinā |
dveṣye pravartate naiva na ca vetti vinā citam
उन्मुखता के अभाव से उसकी निवृत्ति (होगी), किन्तु निर्वृति (आनन्द-विश्रान्ति) के बिना नहीं; द्वेष्य वस्तु में वह प्रवृत्त ही नहीं होता, और चित् के बिना कुछ भी नहीं जानता।