The Vision of Śiva· 1.15 / 49

The Vision of Śiva1.15

1.15
बोधस्य स्वात्मनिष्ठस्य रचनां प्रति निर्वृतिः । तदास्थाप्रविकासो यस्तदौन्मुख्यं प्रचक्षते ॥१५॥
bodhasya svātmaniṣṭhasya racanāṃ prati nirvṛtiḥ | tadāsthāpravikāso yastadaunmukhyaṃ pracakṣate
— बोध का ; — अपने ही आत्मा में निष्ठ का ; — रचना (सृष्टि) के प्रति ; — निर्वृति (आनन्द-विश्रान्ति) ; — उस (सृष्टि) के प्रति आस्था का प्रविकास ; — जो ; — उसकी उन्मुखता ; — कहते हैं

अपने ही आत्मा में निष्ठ बोध की रचना (सृष्टि) के प्रति जो निर्वृति (आनन्दमय विश्रान्ति) है, उस (सृष्टि) के प्रति उसकी आस्था का जो प्रविकास है, उसी को उसकी 'उन्मुखता' कहते हैं।