The Vision of Śiva1.14
आरम्भे दृष्टिमापात्य तदौन्मुख्यं हि गम्यते ।
व्रजतो मुष्टितां पाणेः पूर्वः कम्पस्तदेक्ष्यते ॥१४॥
ārambhe dṛṣṭimāpātya tadaunmukhyaṃ hi gamyate |
vrajato muṣṭitāṃ pāṇeḥ pūrvaḥ kampastadekṣyate
— आरम्भ में ; — दृष्टि ; — डालकर, आपातित करके ; — उसकी उन्मुखता ; — निश्चय ही ; — जान ली जाती है ; — (मुट्ठी बनने को) उद्यत का ; — मुट्ठी में ; — हाथ का ; — पूर्व, पहला ; — कम्प ; — तब ; — देखा जाता है — यदि आरम्भ में ही दृष्टि डालकर देखा जाए, तो उसकी वह उन्मुखता निश्चय ही जान ली जाती है; जैसे मुट्ठी बनने को उद्यत हाथ में पूर्व कम्प तब देखा जाता है।