Parātrīśikā· 1.30 / 36

Parātrīśikā1.30

1.30
तत्र सृष्टिं यजेद् वीरः पुनर् एवासनं ततः । सृष्टिं तु सम्पुटीकृत्य पश्चाद् यजनम् आरभेत् ॥३०॥
tatra sṛṣṭiṃ yajed vīraḥ punar evāsanaṃ tataḥ | sṛṣṭiṃ tu sampuṭīkṛtya paścād yajanam ārabhet
— वहाँ, तब ; — सृष्टि — वर्ण-सृष्टि-क्रम ; — यजन करे, पूजा करे ; — वीर — शूर साधक ; — पुनः, फिर ; — तब आसन ही (एव + आसन) ; — तदनन्तर ; — सृष्टि ; — और, ही ; — सम्पुटित करके — दोनों ओर से घेरकर (सम्पुट) ; — पश्चात्, बाद में ; — यजन — पूजा ; — आरम्भ करे, प्रारम्भ करे

वहाँ वीर सृष्टि (सृष्टि-क्रम) का यजन करे, फिर पुनः आसन का; और सृष्टि को सम्पुटित करके (दोनों ओर से घेरकर), तदनन्तर यजन आरम्भ करे।