Parātrīśikā· 1.3 / 36

Parātrīśikā1.3

1.3
ताम् मे कथय देवेश येन तृप्तिं व्रजाम्य् अहम् । श्रीभैरव उवाच । शृणु देवि महाभगे उत्तरस्याप्य् अनुत्तरम् ॥३॥
tām me kathaya deveśa yena tṛptiṃ vrajāmy aham | śrībhairava uvāca | śṛṇu devi mahābhage uttarasyāpy anuttaram
— उसको, उस (शक्ति) को ; — मुझे ; — कहिए, बताइए ; — हे देवेश — देवों के ईश ; — जिससे ; — तृप्ति, सन्तोष ; — मैं प्राप्त करूँ ; — मैं ; — श्रीभैरव — पूज्य भैरव ; — बोले, कहा ; — सुनो ; — हे देवी ; — हे महाभागे — महान् भाग्यशालिनी ; — उत्तर (श्रेष्ठ) से भी ; — अनुत्तर — जो उत्तर से भी परे है

हे देवेश, मुझे उसके विषय में कहिए, जिससे मैं तृप्ति को प्राप्त करूँ। श्रीभैरव ने कहा — हे देवी, हे महाभागे, सुनो — उस अनुत्तर को, जो उत्तर (श्रेष्ठ) से भी परे है।