Parātrīśikā· 1.22 / 36

Parātrīśikā1.22

1.22
शिवो विश्वद्यनन्तान्तः परं शक्तित्रयं मतम् । तदन्तर् वर्ति यत्किंचिच् छुद्धमार्गे व्यवस्थितम् ॥२२॥
śivo viśvadyanantāntaḥ paraṃ śaktitrayaṃ matam | tadantar varti yatkiṃcic chuddhamārge vyavasthitam
— शिव ; — विश्व से अनन्त तक (जिसका विस्तार विश्व से अनन्त तक) ; — परम, परे ; — शक्तित्रय — तीन शक्तियों का समूह ; — माना गया है, समझा गया है ; — उसके भीतर ; — विद्यमान, स्थित ; — जो कुछ भी ; — शुद्ध मार्ग पर ; — व्यवस्थित, प्रतिष्ठित

शिव, विश्व से लेकर अनन्त तक (व्याप्त), और (उससे) परे — शक्तित्रय ऐसा माना गया है; और उसके भीतर जो कुछ भी विद्यमान है, वह शुद्ध मार्ग पर प्रतिष्ठित है।